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नो कॉन्टैक्ट, दिन-ब-दिन: शुरुआती महीने अक्सर कैसे होते हैं

नो कॉन्टैक्ट के पहले दिन, हफ़्ते और महीने अक्सर कैसे होते हैं, और हर दौर में आमतौर पर क्या काम आता है। आम अनुभवों और रिसर्च पर आधारित।

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किसी से उबरने का कोई तय टाइमटेबल नहीं होता, और लोगों में बहुत फ़र्क़ होता है।1 लेकिन कुछ बातें इतनी बार सामने आती हैं कि उन्हें पहले से जान लेना मदद करता है। नीचे दिए गए दौर उन अनुभवों पर आधारित हैं जो लोग आमतौर पर बताते हैं। यह कोई क्लिनिकल टाइमलाइन नहीं है, और तुम्हारे हफ़्ते अलग दिख सकते हैं। जहाँ रिसर्च कुछ कहती है, वहाँ उसका लिंक दिया गया है।

दिन 1–3: शुरुआत के कुछ दिन अक्सर सबसे मुश्किल होते हैं

इन दिनों मैसेज करने की इच्छा आमतौर पर सबसे तेज़ होती है। ये शुरुआती दिन मुश्किल होते हैं: फ़ोन हर वक़्त पास रहता है, और ख़ालीपन भरने के लिए अभी कुछ और नहीं होता। ब्रेकअप के ठीक बाद भावनाएँ भी अक्सर सबसे ज़्यादा ऊपर-नीचे होती हैं।2

आमतौर पर क्या काम आता है: हर वह चीज़ जो उन्हें मैसेज करने से पहले तुम्हें एक पल के लिए रोक दे। उनकी पोस्ट म्यूट कर दो, चैट नज़रों से हटा दो, और जो कहना है, उसे ऐसी जगह लिखो जहाँ से वह भेजा न जा सके।

दिन 4–14: दिन आसान होने लगते हैं, शामें अब भी मुश्किल होती हैं

दिन का ज़्यादातर हिस्सा उनके बारे में सोचे बिना गुज़रने लगता है। शामें ज़्यादा भारी होती हैं: करने को कम होता है, और मन में पूरे दिन की वे बातें जमा होती हैं जो उन्हें बतानी थीं।

आमतौर पर क्या काम आता है: जब तक मन साफ़ है, संपर्क बंद करने की अपनी वजहें लिख लो, और जब संपर्क करने का मन हो, उन्हें फिर से पढ़ो।

दिन 15–30: दर्द कम होने लगता है, और तभी दबे पाँव शक आता है

एक ख़याल आता है: इतना बुरा भी नहीं था। यादें सबसे बुरे हिस्सों को सबसे पहले धुंधला कर देती हैं। अक्सर इसी वक़्त लगने लगता है कि संपर्क करने में कोई हर्ज नहीं। यह किसी संकट में नहीं होता, बल्कि किसी आम-सी शाम को, जब लगता है कि एक मैसेज से कुछ नहीं बदलेगा।

यह जानना काम का है कि संपर्क का अक्सर क्या असर होता है। एक महीने चली एक स्टडी में, जिसमें ब्रेकअप के बाद युवाओं से रैंडम पलों पर उनकी भावनाएँ पूछी गईं, एक्स से संपर्क का संबंध प्यार और उदासी के ज़्यादा धीरे कम होने से पाया गया।2

आमतौर पर क्या काम आता है: शुरुआत में जो लिखा था, उसे फिर से पढ़ो। तब तुम्हें अपनी वजहें ज़्यादा साफ़ दिख रही थीं।

दिन 31–90: अब सबसे पहले उनका ख़याल नहीं आता

कुछ होता है, और तुम्हें एहसास होता है कि उन्हें बताने के लिए तुमने फ़ोन नहीं उठाया। यादें रहती हैं, लेकिन अब उतनी चुभती नहीं। इस दौर में एक-दो बुरे दिन आने का मतलब पीछे लौटना नहीं है।

रिसर्च भी दिखाती है कि यह दौर अलग-अलग लोगों के लिए कितना अलग हो सकता है। एक स्टडी में ब्रेकअप के बाद 87 युवा महिलाओं को 30 हफ़्तों तक ट्रैक किया गया: 10 में से 4 से ज़्यादा पूरे समय काफ़ी हद तक स्थिर रहीं, एक चौथाई जल्दी उबर गईं, और क़रीब पाँचवाँ हिस्सा धीरे-धीरे उबरा।1

आमतौर पर क्या काम आता है: अगर उनकी फ़ोटो या पुरानी चैट अब भी तुम्हें पीछे खींचती हैं, तो उन्हें कुछ समय के लिए नज़रों से दूर कर दो।

दिन 91 से आगे: नो कॉन्टैक्ट अब आम लगने लगता है

कुछ महीनों बाद उनसे संपर्क करने का ख़याल धीरे-धीरे कम आने लगता है। जर्मनी के युवाओं पर हुई एक बड़ी स्टडी में ब्रेकअप के बाद आत्मसम्मान में आई गिरावट एक साल के अंदर ख़त्म हो गई, चाहे उन्हें कोई नया साथी मिला हो या नहीं।3 और एक स्टडी में, जिसमें युवाओं को 20 से 28 साल की उम्र तक ट्रैक किया गया, 20 की उम्र में ब्रेकअप से कोई कितना परेशान था, इससे यह अंदाज़ा नहीं मिलता था कि 28 की उम्र में उसका हाल कैसा होगा। जिन्होंने तब ज़्यादा संघर्ष किया था, उनमें आगे चलकर रिश्ते निभाने के हुनर अक्सर ज़्यादा दिखे।4

आमतौर पर क्या काम आता है: जब मदद चाहिए, ऐप खोल लो। कुछ समय के लिए इसे भूल जाना भी ठीक है।

पड़ाव वाले दिन

nocnt दिन 3, 7, 14, 30, 60, 90, 180 और 365 को पड़ाव के तौर पर दिखाता है। ये ध्यान देने के पल हैं, डेडलाइन नहीं। किसी भी स्टडी में दिनों की ऐसी कोई संख्या नहीं मिली जो सब पर लागू हो। इस पर और जानकारी नो कॉन्टैक्ट रूल में।

अगर आसान नहीं हो रहा

कुछ लोगों के लिए यह महीनों तक मुश्किल बना रहता है। ऊपर वाली 30 हफ़्तों की स्टडी में 10 में से क़रीब 1 पूरे समय परेशानी में रही, और ब्रेकअप के बारे में बार-बार सोचते रहना उनमें ज़्यादा आम था जो धीरे-धीरे उबरीं या बिल्कुल नहीं उबर पाईं।1 कुछ लोगों के लिए, ख़ासकर कम उम्र के लोगों के लिए, ब्रेकअप डिप्रेशन की शुरुआत होता है।5

अगर उदासी, नींद की दिक्कत या रोज़मर्रा की चीज़ें न सँभाल पाना हफ़्तों तक चलता रहे, तो किसी डॉक्टर या थेरेपिस्ट से बात करो। अगर तुम संकट में हो या तुम्हारे मन में खुद को नुकसान पहुँचाने के ख़याल आ रहे हैं, तो अमेरिका में 988 पर कॉल या मैसेज करो, या findahelpline.com पर अपने देश की हेल्पलाइन ढूँढो।

स्रोत

  1. Verhallen, A. M., Alonso-Martínez, S., Renken, R. J., Marsman, J.-B. C., & ter Horst, G. J. (2022). Depressive symptom trajectory following romantic relationship breakup and effects of rumination, neuroticism and cognitive control. Stress and Health, 38(4), 653–665. doi.org/10.1002/smi.3123. 18–34 साल की 87 डच महिलाएँ, जिनका 30 हफ़्तों तक हर दो हफ़्ते में आकलन हुआ। ↩ ↩2 ↩3

  2. Sbarra, D. A., & Emery, R. E. (2005). The emotional sequelae of nonmarital relationship dissolution: Analysis of change and intraindividual variability over time. Personal Relationships, 12(2), 213–232. doi.org/10.1111/j.1350-4126.2005.00112.x. 58 युवा, 28 दिनों तक; सहसंबंध पर आधारित। ↩ ↩2

  3. Luciano, E. C., & Orth, U. (2017). Transitions in romantic relationships and development of self-esteem. Journal of Personality and Social Psychology, 112(2), 307–328. doi.org/10.1037/pspp0000109. तीन जर्मन समूहों के 9,069 युवा। ↩

  4. Shulman, S., & Yonatan-Leus, R. (2024). The longitudinal correlates of breakup distress in early young adulthood: Future distress and future benefits. Journal of Social and Personal Relationships, 41(10), 3008–3030. doi.org/10.1177/02654075241260358. 124 युवा, जिन्हें 20 से 28 साल की उम्र तक ट्रैक किया गया। ↩

  5. Monroe, S. M., Rohde, P., Seeley, J. R., & Lewinsohn, P. M. (1999). Life events and depression in adolescence: Relationship loss as a prospective risk factor for first onset of major depressive disorder. Journal of Abnormal Psychology, 108(4), 606–614. doi.org/10.1037/0021-843X.108.4.606. ↩

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